सिलवासा की सड़कों पर चलना इन दिनों किसी मुसीबत से कम नहीं। हर ओर खुदाई, मलबा और अधूरी सड़कों का मंजर है। कांट्रेक्टरों की मनमानी, बिना सोच-समझ के एकसाथ शुरू किया गया काम और धीमी रफ्तार, इसने हर आम नागरिक की ज़िंदगी को बेहाल कर दिया है। सवाल यह नहीं कि सड़क कब बनेगी, सवाल यह है कि क्या कोई समझदारी से इसे बना भी रहा है? क्या विकास की कीमत सिर्फ जनता ही चुकाएगी?दादरा नगर हवेली की भौगोलिक बनावट विशिष्ट है। यह इलाका पहाड़ियों से घिरा हुआ है, जहां मानसून के समय भारी वर्षा होती है। ऐसे मौसम में अधूरे सड़क निर्माण कार्य से मिट्टी धंसने, जलभराव और कीचड़ की स्थिति बन जाती है। इस भौगोलिक स्थिति को नजरअंदाज कर सड़कों की खुदाई करना ठेकेदारों की अपरिपक्वता को दर्शाता है।किसी भी शहर में यदि एक साथ सभी सड़कों की खुदाई कर दी जाए, तो न केवल यातायात व्यवस्था चरमरा जाती है, बल्कि आपातकालीन सेवाओं, स्कूल, कार्यालय और छोटे व्यवसाय भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं। सिलवासा में ऐसा ही हुआ। किसी ने नहीं सोचा कि इन गड्ढों में जनता का धैर्य डूब जाएगा।कांट्रेक्टरों पर समय सीमा को लेकर कोई जवाबदेही तय नहीं दिख रहा है। नागरिको के मन में कई सवाल हैं – सड़क कब तक तैयार होगी ? कितना समय और लगेगा? इतना विलंब क्यों हो रहा है ? एक सड़क तैयार किए बिना दूसरे की खुदाई क्यों? कितने कांट्रेक्टरों को काम दिया गया है? बीच बीच में कार्य धीमा या बंद क्यों हो जा रहा है? जनता की शिकायतें और प्रश्न बहुत है लेकिन जवाब कहां से मिलेगा इसकी जवाबदेही तय नहीं है।बारिश में जहां एक ओर गड्ढे पानी से भर जाते हैं, वहीं दूसरी ओर सड़कों पर कीचड़ का साम्राज्य फैल जाता है। दुपहिया वाहन फिसलते हैं, पैदल चलने वाले गिरते हैं, और वाहनों की मरम्मत का खर्च बढ़ता है। प्रदेश में अब विकास कम, विनाश ज़्यादा नज़र आता है। ऐसे में जनता का गुस्सा सोशल मीडिया पर फूट रहा है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर हालात जस के तस हैं।बुद्धिजीवियों का कहना है कि सड़क निर्माण कार्य को चरणों में विभाजित करना चाहिए। मानसून से पहले निर्माण कार्य पूरा करने की नीति होनी चाहिए अथवा काम को इस स्तर तक पहुंचा दिया जाए की परेशानी कम हो। कांट्रेक्टरों के लिए सख्त नियम और दंडात्मक प्रावधान अनिवार्य किए जाएं। साथ ही, हर प्रोजेक्ट की जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड हो ताकि पारदर्शिता बनी रहे।सड़कें केवल गड्ढों से नहीं, नागरिकों के धैर्य से भी बनती हैं। विकास की नींव सशक्त योजना पर होनी चाहिए, न कि अंधी खुदाई पर।

